आज का आदमी अपने खिलाफ कुछ नही सुनना चाहता (माफ़ करे आदमी से मेरा तात्पर्य सिर्फ़ पुरूष नही है इसमे स्त्री -पुरूष दोनों आते हैं ) है वह इस अंहकार में हमेशा रहता है की मैं ही सही हूँ । मैं जो सोचता हूँ वह बेहतर है ,मैं जो करता हूँ वही काम है ,मैं जो कहता हूँ वही वाक्य है इसिलए इतना बेचैन है आज का आदमी ,आज का आदमी कसौटी पर उतरना नही जानता वह भाग रहा है । कुछ समझने का समय उसके पास नही है कुछ सुने से पहले वह चल देता है ,बहुत सोचा तो यह की पहले सब अच्छा था ,फ़िर पीछे भगा मूल्यों को समझने के बजाय वह चल देता है ।
आज का आदमी इतना संकुचित ह्रदय वाला है की उसके दिल में एक सुंदर मन -जो उसे शान्ति दे सके नही समां पाता अगर कोई उसे इसका हल बताये तो वह चला ।
आज का आदमी कागज़ का फूल है जो ऊपर से सुंदर भीतर का कल्पना से परे अगर आपने उसे आइना दिखाया तो वो चला ।
वह ऊपर नही नीचे से ही सब कुछ पाना चाहता है ख़ुद को नही देखता पर दूसरों को पूरा देखता है अगर आपने ग़लत कहा तो वह चला ।
पहले सब बहुत अच्छा था यह कहता है आज का आदमी पर अगर उस पर चलने को कहो तो वह चला ।
सबको उपदेश देता आदमी -आप पूछो की आप कितना पालन करते है इन उपदेशो का तो वह चला ।
आइये बताऊँ इंसान क्या होता है अरे !तू फ़िर बोला मैं तो चला ।
Sunday, 4 October 2009
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