मैं एक घड़ी हूँ । कलकत्ता की एक दूकान में १९७२ में अपनी सखियों के साथ बैठी मुस्कुरा रही थी । मेरा रंग सुनहरा है । मैं एक दम सोने जैसी दिख रही थी । एक दिन एक १८ वर्षीय लड़की दूकान पर आई उसे मैं भा गयी ,उसने मुझे ले लिया । उसने मुझे अपनी शादी में पहना मैं भी उस लड़की के साथ उसकी ससुराल आ गई । वह अपनी सुंदर कलाई पर जब मुझे पहनती तो वह बहुत खुश होती मेरे रूप पर । मैं उस घर में सबको भाति थी उस समय पूरे आस पास के लोगों के पास मुझसे सुंदर कोई नही था । उस घर की एक लड़की मुझे लेना चाहती थी ,प़र मेरी मालकिन मुझे बहुत प्रेम करतीं थी । उसने जिद की -मुझे भी ऐसी घड़ी चाहिए ।
जिसके साथ मैं आई आज भी वह मुझसे प्रेम करतीं हैं मैं भी उनका साथ निभा रही हूँ । इस लम्बी यात्रा में कई बार मैं महीनों ऐसे ही पड़ी रहती थी । प़र जब कभी मेरी मालकिन मुझे चाभी देती है तो मैं अवश्य उनको समय बताती हूँ ।
हमारी मालकिन के पुत्र ने उन्हें एक और घड़ी लाकर दी है वो मुझसे बहुत सुंदर है । मैं अब थक जाती हूँ मेरी पालिश भी धुंधली हो गई है । लेकिन मेरी मालकिन मेरी सुध हफ्ते में एक बार जरुर लेतीं है । वे मुझे अपने कमरे में सामने आलमारी प़र ही रखतीं हैं । मैं उनसे रोज मिलती हूँ और वे भी मुझे देखतीं हैं । अपने बेटे की लायी हुई घड़ी को वे बड़े प्यार से धूल से बचाकर रखतीं हैं ।
प़र मुझे भी नही भूलीं जिस दिन मुझे चाभी मिल जाती है उस दिन मैं उनको १० से १२ घंटे चलकर दिखातीं हूँ । मेरी चाहत है वे मुझे अपने पास ही रहने दे । मैं उनके समय की साक्षी जो हूँ । मैं आपको अपना नाम बता दूँ -
मैं हूँ --"एच एम् टी नूतन "! १२/१२/०९
Saturday, 12 December 2009
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