Wednesday, 8 October 2008

भागवत से

आज हम चतुश्लोकी भागवत को जानेगे कहा गया है की भागवत का यह चार श्लोक पूरे भागवत के पढने का फल देता है ,सारे काम सारी इक्षाएं इसे पढने से पूरी होती है । यह चार श्लोक भगवान् ने कहा है ,यह भागवत का बीज है। यह चार श्लोक ब्रम्हा ने नारद मुनि को दिया ,नारद ने ब्यास को ,ब्यास ने शुकदेव जी को ,शुकदेव ने महाराज परीक्षित को और सूत जी को दिया फिर ऋषियों के द्बारा आज यह अमृत हम तकआया । भगवान् ने स्वयं कहा है

भगवान् उवाच - अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यतसद्सत्परम । पश्चाद हं यदे तच्च यो वशिश्येतसो स्म्यहम ।
ऋइतेर्थ यत प्रतियेत न प्रतियेत चात्मनि । ताद्विदात्मानोमाया यथाभासो यथा तमः ।
यथा महान्ति भूतानिभुतेशुच्चाव चेश्वनु । प्रविष्त्तान्य प्रविश्त्तानी तथा तेषु न तेश्वहम ।
एतावदेव जिग्यासं तत्व जिज्ञासु नात्मन :। अन्व्याब्यातिरेका भ्याम यत स्यात सर्वत्र सर्वदा ।
सृष्टि के पूर्व में मैं था न स्थूल था न सूक्ष्म न ज्ञान था न अज्ञान- जहाँ कुछ नही वहाँ मैं ही मैं हूँ इस सृष्टि के रूप में जो कुछ दिख रहा है वो भी मैं हूँ । जो रहने पर भी नही दिखाई देती उसे मेरी माया ही samajhna चाहिए .

शुरू में मैं ही था जब कुछ नहीं था उस समय जो भी था वही ईश्वर है ,शून्य से सर्जन नही होता .तत्व की दृष्टी से सम्भव नही है पहले बीज था तभी रचना हुई । जो था जिसे भी बीज मानो वही ईश्वर है और वो हमेशा था प्रकृति के रूप में ,होना ही उसका स्वभाव है
पश्चाद हम -जब सारी सृष्टि का ल य हो जायगा तब भी मैं ही हूँगा यानी था और रहूँगा । हर चीज बदलती रहती है शक्ति या पदार्थ का रूपांतरण होता है नाश नही होता जैसे कोई चीज जली तो पदार्थ बचा रह गया द्रव अंतरीक्ष में किसी न किसी रूप में है ।
संसार में कई चीजे हैं जैसे प्रेम जो दीखता नही पर है । अन्वय -उसे कहते है जब एक की उपस्थिति से दूसरे का एहसास हो जाय ,जैसे दूर कही धुँआ दीखता है तो वहां आग का होना सिद्ध है ठीक इसी तरह भगवान् दीखता नही पर पर सृष्टि तो है न कौन है इसका रचना कार इतनी बड़ी ,इतनी सुंदर ,इतनी अकल्पनीय ,इतनी विराट ,इतनी अद्भुत इस सृष्टि का रचनाकार कौन है ?
व्यतिरेक -यही है यह सृष्टि है इसलिए इसका रचनाकार भी होगा वही है जिसे हम ईश्वर कहते है वो न होता तो सृष्टि न होती सर्जक बिना सर्जन के रह सकता है पर सर्जन तभी होगा जब सर्जक यानि बनाने वाला होगा । गायक बिना गीत के रह सकता है पर गीत तभी होगा जब गाने वाला होगा ।
सारे संसार को चेतना देने वाला दीखता नही पर है हम उसकी कृपा पर ही साँस लेते है बदले में वो हमसे कुछ नही लेता । जब सारा संसार सो जाता है निष्क्रिय हो जाता है उसकी प्रकृति तब भी अपना काम करती है । वो हम सब की ख़बर रखता है किसे क्या चहिये ।
इस संसार को ईश्वर ने अपने रहने का निवास बनाया ,संसार असार नही है ,छल भी नही ,झूठ भी नही कहाँ जाओगे छोड़ कर इसे अपने धर्म के पथ पर चल कर सुंदर बनाओ ।
संसार में ईश्वर ने सुविधा की ब्यवस्था की है हम उसके बनाये इस घर को संवार कर स्वर्ग बना सकते है उसने हमारे लिए समय निश्चित कर रखा है जब तक रहो बनाओ । यही सत्य है
"श्री कृष्ण को वासुदेव के पुत्र को जिनका नाम हरी है ,जिसको प्रणाम करते ही क्लेश का नाश हो जाता है "उन गोविन्द को नमन !