Tuesday, 23 September 2008

नारायण नारायण !!!

ऐ मेरे मन, तू इस पावन नाम की धुन पर सासों के तारों को कस ले, नारायण अपनी पवित्र उंगलियों से इसे जब तक बजाएँ, तू सुन । तू सुन कि वो क्या कह रहे हैं, उसमे समा कर देख। बड़े संतो ने माना है की उनका रूप करोडों काम को लजाता है, उनका ऐश्वर्य अनंत है, वो प्रेम की खान हैं, दया के सागर हैं, गुण उनको पाकर ही यश पाता है, वेद भी जिनके सामने नेति नेति कह कर पुकारते हैं, जो काल का भी काल है, लक्ष्मी जिनके चरण दबाती है, जो सारी सृष्टि को चेतना देता है, जो अधर्म का नाश करने के लिए मनुष्य अवतार धारण कर पृथ्वी पर आते है । हमें जीवन को जीना सिखाते है और मृत्यु को अमर कसे बनाएँ, यह भी बताते हैं। हम पृथ्वी वासी उनको नारायण कहते हैं ।

इस विचार को आज आगे ले चलते हैं ।

हम नारायण को प्रसन्न करने के लिए धर्म को धारण करे । जीवन में सत्य को जोड़ दो इससे शक्ति ,सम्पत्ति व सुख तीनो आता है। प्रमाद मृत्यु है ,नही होना चाहिए । आज का आदमी असत्य के सहारे सुख खोजता है, आ भी सकता है पर बहुत थोड़े दिन के लिए । सत्य से आया सुख अखंड रहता है, सुख कभी क्षीण न हो इसलिए सत्य का आश्रय लो । सत्य बोलने वाला परेशान हो सकता है ,पराजित नहीं। इसमे बड़ी ताकत होती है, इसे वही अपना सकता है जिसमे आत्म -बल बहुत है । कमजोर व्यक्ति इसे नही पा सकता, 'सत्य 'परमात्मा का रूप है । सत्य परम पवित्र है जो हमें निर्भय बना देता है ,एक प्रकार से ये भाव की उच्चता है । अगर मुझे अभी प्रकाश चाहिए तो सत्य का संग करना होगा, यह धर्म का प्रथम सोपान है । हम धर्माचरण करे, किस प्रकार करे, धर्म को जानें, ईश्वर को जानें ।

भक्ति ,समर्पण, उपासना ,प्रेम आदि इसकी चर्चा आगे करेंगे । सबको शकुन का नमन।

धर्माचरण -वह आचरण को शत्रु को भी पीड़ित न करे इसे जीवन में सहज रूप से अपनाना चाहिए ,आचरण में लाना चाहिए धीरे धीरे यह आदत में आ जाता है और बड़ा आनंद मिलता है । धर्म की चर्चा हम कल करेंगे ,यह बड़ा सूक्ष्म विषय है ।

भक्ति -यह बड़ी सरल है इसमे कोई बंधन ,कर्मकांड नही है यह किसी भी अवस्था में कही भी कर सकते है । स्व को भुला कर पवित्र मन से नारायण में लीन हो जाना ही भक्ति है । उनसे मिलने की तड़प जब उत्पन्न हो, उनसे प्रिय और कुछ न लगे, चित्त, ज्ञान, कर्म सबमें उसका वास हो, वही भक्ति है । यह एक अंतरंग अनुभूति है।

समर्पण -यह स्वामी और सेवक का सम्बन्ध है । ऐसा माने कि जो है, सब उसका है। शरीर ,मन ,प्राण ,धन ,यश सब उनका है, हम उनके सेवक है, जब तक वो चाहे हमें उनकी सेवा में रहना है । उनको परम पावन वस्तु - दो अश्रु का जल दो ।

उपासना -हम सेवा करें, मन से, कर्म से, पर संकोच भी रहे की कहीं कुछ ग़लत न हो जाए । श्रद्धा पूरी हो । प्रेम -यह आत्म ज्योति है । शरीर को इस संसार में रखो पर मन को ईश्वर में गोपियों की तरह । जब ईश्वर से प्रेम करोगे तो ज्ञान और वैराग्य स्वतः आ जायगा । प्रेम का स्थान है ह्रदय । इसमें केवल त्याग होता है, ऐसा होते ही भगवन भक्त के हो जाते है । यह हजारो ऋषियों द्वारा आजमाया हुआ है । पहले भगवन आगे रहते हैं, भक्ति के आते ही भक्त आगे हो जाता है । भक्ति स्त्री है भगवान उसके पति । भक्ति श्रेष्ठ मानी गई है ।

chetna

यह मेरा पहला ब्लॉग है। हम इसे गुरुदेव को समर्पित करते हैं ।यहाँ दोनों तरह के लोग बहुत दुःख देते हैं । जब अच्छे दूर हो जाए तो प्राण हर लेते हैं, दुर्जन जब मिलते हैं तो बहुत दुःख देते हैं। सुजन की संगतितीर्थ का आनंद देती है , दुर्जन की संगति दारुण दुःख देती है ।
मलय पर्वत के संग से काष्ट चंदन बन जाता है । सुंदर वाणी ही यश का संग पाती है जो गंगा की तरह सब का कल्याण करती है । वाणी की सुन्दरता उत्तम धन है जो माँ सरस्वती की कृपा से मिलता है । माँ आप मुझ पर कृपा करें और मुझे थोड़े से यश का भागी बनाये । कहते हैं जो आपकी कृपा पा जाता है उसकी ओर सबकी नजर उठती है । हम पहले आपको प्रणाम करते हैं ।

२/१०/2008

शुद्ध ज्ञान और शुद्ध भक्ति एक ही है । शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है, शुद्ध भक्ति भी वहीं ले जाती है। ज्ञान का मार्ग थोड़ा कठिन है पर भक्ति का मार्ग अति सरल है !

ईश्वर प्रेम और मनुष्य के प्रेम में इतना अन्तर जानो -संसारी आदमी के निन्यानवे उपकार करो और एक अपकार करो तो लोग तुम्हे नही सह सकेंगे ,ईश्वर के साथनिन्यानवे अपराध करो और एक काम उसकी पसंद का करो तो वो तुम्हारा सारा अपराध क्षमा कर देंगे !

-स्वामी रामकृष्ण परम हंस !



६/१०/२००८

जीव,माया और भगवान् -

वेद कहता है जीव भगवान् का अंश है लेकिन जीव पर सदा से माया का अधिकार है अगर हम साधना कर ले तो माया भाग जायगी । माया के द्बारा भगवान् लीला करते है जीव और माया भगवान् की शक्ति है इसलिए उनका अंश है, भगवान् हमारे पिता और माँ है हम माया को अगर जीतना चाहते है तो नारायण की भक्ति करनी होगी !

'श्री कृष्ण 'कहते है -हे अर्जुन सुन 'मैं ही ब्रम्हा की प्रतिष्ठा हूँ, प्रकृति हूँ, भगवान् हूँ। मैं सब का कारण हूँ पर मेरा कारण कोई नही। एक जगह रह कर भी सर्व व्यापी हूँ । ब्रम्ह ,भगवान् और परमात्मा मैं हूँ मैं ही आनंद हूँ । आनंद मुझमे नही मैं स्वयं आनंद हूँ जो मुझे भजता है मेरी संगत में आता है वो भी बड़ा बन जाता है ।

जो दूसरो को बड़ा बना दे वही भगवान् है वो जिसे चाहे बड़ा बना दे क्योंकि वो अनंत है ,असीमित है वो इतना बड़ा है की उससे बड़ा और कोई नही है वो ज्ञान ,आनंद सब देता है उसे जान लो तो सब जान जाओगे ।

जीव इस संसार में आता है। यह बड़ा सूक्ष्म होता है, ह्रदय मैं रहता है और पूरे शरीर को अपनी चेतना देता है, जीव अल्पज्ञ है, कर्म फल भोगने आता है, भगवान् मायाधीश है , हम मायाधीन - हम तो एक विषय को भी पूरी तरह नही जान पाते ।

भगवान् अपनी सत्ता और ज्ञान दोनों देते है पर सृष्टि करने का अधिकार किसी को नही देते । कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, पर भगवान का ये अधिकार कोई नहीं पा सकता है। सृष्टि , संहार और रचना वो ही कर सकता है। जीव भगवान् का अंश है, भक्ति इसका धर्म है, माया इसे नाच नचाती है पर भक्ति इसे उबार लेती है ।



माया -जहाँ भगवान् नही रहते वहां माया रहती है । माया भगवान् के बिना रह सकती है लेकिन जहाँ भगवान् रहते हैं माया वहां नही टिकती । वो लज्जित हो कर भाग जाती है क्योकि माया को केवल भगवान् ही जीत सकते हैं । ये बड़े -बड़े मुनियों के धर्म को भी डिगा देती है। ये प्रभु की परछाई है इसलिए बलवान है ।

वेद कहता है भगवान को पाया जा सकता है आइये जाने कैसे -

हमारे आँख, कान, मन, बुद्धि तभी काम करते है जब भगवान इसमे शक्ति देता है। वो मन और वाणी से परे है पर हम उसे महसूस करते है और केवल मनुष्य ही इस तत्व का अधिकारी है । जब वो मन ,बुद्धि ,वाणी से परे है तो जीव क्या करे कैसे उसे पाए? वेद कहते हैं - हम भगवान् की कृपा से ही भगवान् को पा सकते है अर्जुन पर भगवान् की कृपा थी इसलिए वो जान सका , कृपा इसलिए थी क्यो की अर्जुन धर्म पथ पर था । कुरुक्षेत्र में तमाम सैनिक थे पर गीता का ज्ञान सिर्फ अर्जुन ही पा सका।

सत्य को कर्म से ,चित्त को ज्ञान से और आनंद को भक्ति से जोड़ कर उनकी कृपा पा सकते है पर कर्म ,नियम ,तप कठिन मार्ग है जरा सी चूक भी इसमें मानी नहीं जाती तो क्या करे । तो हम केवल नाम जप से उनकी कृपा पा लेंगे बहुतो ने पाया है हम क्यो नही यही कामधेनु है ऐसा संतो ने कहा है । रामकृष्ण परम हंस जिसे छू लेते थे उसे भगवान के दर्शन हो जाते थे वो पढ़े लिखे नही थे ज्ञान की मोटी किताबे नही देखे पर माँ काली के भक्त थे एक बालक की तरह माँ की भक्ति करते करते परम हंस हो गए । 'सरल स्वाभाव न मन कुटिलाई' बस उसे पुकारो, वो सुनेगा । दास का भाव रखो, वो सुनेगा । नारायण !

७ /१०/२००८

या देवी सर्वभूतेषु भक्तिरूपेण संस्थिता -

जीवन संघर्ष पूर्ण है। इसमे आनंद ,शान्ति खोजना पड़ता है जो न आग्रह से, न अधिकार से मिलता है वो अनुग्रह से मिलता है । अर्जी दो प्रार्थना की फिर प्रतीक्षा करो गोपियों पर भगवान् ने अनुग्रह किया तभी उन्होंने अपनी इन्द्रियों का तर्पण 'श्री कृष्ण 'के चरणों में किया यही प्रेम है और भक्ति भी । शक्ति की उपासना किए बिना भक्ति नही मिलती भगवान् ने भी माँ दुर्गा की उपासना की थी गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए माँ कात्यायनी की उपासना की । गोपियों का प्रेम समझने के लिए देह और बुद्धि से परे जा कर सोचना होगा । भगवान् का चीर हरण करना 'देह आवरण भंग है 'वह भगवत आसक्ति है पूर्णिमा के चाँद की तरह निर्मल मन और ह्रदय बनाओ तो रास में प्रवेश मिलेगा भगवान् की । गोपी कहती है हमने अपनी कामना आपके चरणों में रख दी है अब हम कहाँ जाय तुम्हारी वंशी हमारा मन हर लेती है । भगवान् को योग माया का साथ है वो वंशी में प्राण बन जाती है जो उस धुन को सुनता है वो सुध खो देता है गोपियों को देह का भान नही है न समाज का भान है वो बस वंशी की धुन पर भागती आती है न रात देखती है न दिन। वंशी की धुन और प्राण एक हो गए है पर वो तभी आयगा जब गोपियों की तरह प्रेम करो । भगवान् अपनी भक्ति जल्दी नही देते क्योकि वो कहते है "अहम् भक्त पराधीनो "भक्ति देने पर भगवान् बंध जाते है इसलिए भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है ।



८/१०/२००८ नारायण

वेद कहते है अगर दुःख के बोध से ऊपर जाना है तो अपने में सर्व को स्थापित करो ,चित बृत्ति नही बदलती आपका ब्योहार कर्म की धारणा और चित्त बृत्ति के कारन बदलता है आपकी बुद्धि ने जिसे अच्छा माना वह अच्छा जिसे नही माना वह बुरा है इसलिए सब में उसको देखो ईश्वर के विग्रह से शुरू करो ,परमाणु तक पहुच जाओगे । क्रोध में क्षमता से अधिक कार्य हो जाते है । क्रोध ,काम ,लोभ ,भय इसमे भी उर्जा है इसे रूपांतरित कर दो इसे क्षमा ,दया और करुना में बदल दो । त्याग व् अभय में बदल दो मन को बदल दो और कुछ नही .हम आपको एक कथा सुनाते है -

कबीर के घर के सामने एक वेश्या रहती थी उसके घुघरुओ में कबीर को राम नाम सुनाई देता था वो अपनी पूजा में लीनं रहते एक दिन वेश्या के यारो ने कहा इस साधू की कुटी से गुजरते है तो अच्छा नही लगता आना नही चाहता वेश्या ने अपने यारो से कह कर कुटी में आग लगवा दी वही हवा वेश्या के महल को भी जला डाला वह रोते हुए कबीर के पास आई बोली महाराज मुझे क्षमा कर दे मैंने ही आपकी कुटीया में आग लगवाई मुझे क्षमा कर दे । कबीर ने कहा -यह तेरे यार और मेरे यार की लडाई है देखना है की किसका यार बड़ा है । नारायण !

मैं समंदर भी किसी गैर के हाथों से न लू -एक कतरा ही समंदर है अगर तू दे-दे !

शाखे रहीं तो फूल भी पत्ते भी आयेंगे ,ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आयेंगे !


२९/१२/०८

भगवन ने कहा है -मैं प्रतिज्ञा करता हूँ तू दो कदम आ मैं दस कदम आऊंगा ।

मेरे मार्ग पर पैर रख कर तो देख ,मैं तेरे सब मार्ग खोल दूंगा ,मेरे लिए खर्च करके तो देख ,मैं तेरे लिए कुबेर के भंडार खोल दूंगा । मेरे लिए कड़वे वचन सुनकर तो देख ,कृपा न बरसे तो कहना ।

तू मेरी तरफ़ आके तो देख ,तेरा ध्यान न रखूं तो कहना ।

मेरी बात लोंगों से करके तो देख ,तुझे मूल्यवान न बना दूँ तो कहना ।

मेरे चरित्र का मनन करके तो देख ,तुझमे ज्ञान न भर जाय तो कहना ।

मुझे अपनाकर तो देख ,तुझे सबकी गुलामी से न छुडा दूँ तो कहना ।

मेरे लिए आंसुओ को बहा के तो देख ,तेरे जीवन में आनंद न भर दूँ तो कहना ।

स्वयं को न्योछावर करके तो देख ,तुझे सुयश न दिला दूँ तो कहना ।

तू मेरा बन के तो देख ,हर एक को तेरा न बना दूँ तो कहना ।

तू अपने सारे कर्म मुझको अर्पण करता चल तुझे मुक्त न कर दूँ तो कहना


जीवन सूत्र /१४/२/२००९

स्थिर चित्त व्यक्ति को पृथ्वी की तरह निश्चल कहा गया है । स्थिर होने का कोई नियम या समय का बंधन नही है ,इसमे आसक्ति ,लोभ आदि वृत्तियों का नाश हो जाता है ,व्यक्ति कर्तब्य पालन दृढ़ता से करता है और प्रकृति उसका साथ देती है ,उसके शुभ संकल्प को पूरा करने में शुभ शक्तियां साथ होती हैं ।


धैर्य और अक्रोध ,ये दोनों कष्ट के समय कवच का काम करते हैं । जीवन के कई उलझनों से मुक्ति दिला देता है ये ऐसा हथियार है ।

बानी पर विचार पूर्वक नियंत्रन रखना चाहिए इससे बहुत सकारात्मक परिणाम आते है ।

हरी शरणम् !!!